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राजनीति और युद्ध में कूटनीति का सहारा लेना छल नहीं होता

भगवान श्रीकृष्ण धर्म के केंद्र में हैं। उन्हें विष्णु का अवतार और धर्म संस्थापक कहा जाता है। विष्णु के सभी अवतारों का अपना अलग कार्य, उद्देश्य और चरित्र रहा है। जैसे परशुराम आवेश अवतार है तो श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार। इसी तरह श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है।
 
 छल का अर्थ होता है धोखा। चाणक्य का एक वाक्य है कि 'यदि अच्छे उद्देश्य के लिए गलत मार्ग का चयन किया जाए तो यह अनुचित नहीं होगा। मार्ग कैसा भी हो लेकिन उद्देश्य सत्य और धर्म की जीत के लिए ही होना चाहिए।'
 
दरअसल, छल और भेद नीति में बहुत फर्क होता है। छल एक धोखा है जबकि भेद एक युक्ति है। जब युद्ध में सारे नियम तोड़कर कौरव पक्ष ने भगवान श्रीकृष्ण के भानजे अभिमन्यु को निर्ममतापूर्वक मार दिया तो भगवान श्रीकृष्ण को भी नियम तोड़ने का अधिकार स्वत: ही मिल गया। उन्होंने फिर नियमों को ताक में रख दिया और एक के बाद एक वीर योद्धाओं को मरवा दिया। पहले जयद्रथ को युक्तिपूर्वक मारा गया, फिर भीष्म, द्रोण और फिर कर्ण को मारा गया।
चूंकि श्रीकृष्ण भविष्य जानते थे इसलिए उन्होंने भविष्य को बदलने के लिए पहले दुर्योधन के शरीर को वज्र के समान नहीं होने दिया, कर्ण के कवच और कुंडल हथिया लिए और बर्बरीक का शीश दान में मांग लिया। यदि वे यह कार्य नहीं करते तो युद्ध जीतना मुश्किल होता।

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